Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay

Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay विश्वरत्न परमपूज्य बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर

 

Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay विश्वरत्न परमपूज्य बोधिसत्व बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर

Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay ♥️~विश्वरत्न परमपूज्य,,♥️
बोधिसत्व बाबासाहेव
डॉ .भीमराव आंम्बेडकर जी
के
🌹 129वें 🌹
(14 अप्रैल 2020)
जन्म
दिवस पर
🌷कोटि-कोटि🌷
🌸 नमन ! 🌸

इन्जी. चन्द्रसैन बौद्ध
Mo. 85827826364
🍀🍀🍀🍀🍀
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~~~~~
🎯 न पुप्फगन्धो पटिवातमेति न चन्दनं तगर मल्लिका वा।
सतञ्च गन्धो पटिवातमेति सब्बा दिसासप्पुरिसो पवाति।।
धम्मपद-10

अर्थात: संसार में जितने भी फूल हैं, पुष्प, चन्दन, तगर,चमेली आदि किसी की भी सुगन्ध हवा के बहने की दिशा के उल्टी-दिशा में नहीं बहती,किन्तु महापुरूषों (सज्जनों )की सुगन्ध हवा के बहने की उल्टी दिशा में भी जाती है अर्थात सज्जनों के शीलों(कार्यों) की सुगन्ध सभी दिशाओं में बहती है। Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay

🎯 जीवन परिचय:

डा. भीमराव आंम्बेडकर जी का जन्म मध्य प्रदेश में महू (मिलिट्री हेड क्वार्टर्स ऑफ वार) छावनी, इन्दौर में 14 अप्रैल 1891 को सोमवार के दिन हुआ हुआ था। उनके पिता का नाम रामजी सकपाल और माता जी का नाम भीमाबाई था। वे अपने माता पिता की चौदहवीं सन्तान थे।

महार; एक शक्तिशाली और बहादूर जाति:

बाबासाहेब भीमराव आंबेडकर महार जाति में पैदा हुए थे। महार जाति एक ऐसी जाति है, जो शक्तिशाली, समझदार, लड़ाकू और बहादुर कही जाती है। कुछ लोगों का विचार है कि महार ही महाराष्ट्र की मूल निवासी हैं। भारत के यूरोपियन सबसे पहले महारों के ही सम्पर्क में आए। जिससे वे सेना में भर्ती हुए। Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay

पूर्वज अम्बवड़े/अम्बेड़ गांव के निवासी:

डा. बाबासाहेब आंबेडकर के दादा मालोजी/मलनाक सकपाल महाराष्ट्र, रत्नागिरि जिले के अम्बवड़े/अम्बेड़ के निवासी थे। वे ब्रिटिश फौज के एक अवकाश प्राप्त सैनिक थे। उनकी चार संतानों में दो ही बची थी। रामजीराव उनकी चौथी संतान थी। रामजी के बड़ी बहन मीरा पंगु होने के कारण उन्हीं के साथ रहती थी।

उनके परिवार का कुलनाम सकपाल था। इनके दादा जी मालोजी सकपाल सेना में फौजी अफसर बने, जिन्होंने कई लड़ाईयोंं में अपनी शूरता और वीरता का प्रदर्शन करने के कारण उन्होंने 19 पदक प्राप्त किये। रामजी सकपाल ने भी अपने पिता का अनुशरण करते हुए 14 साल तक सूबेदार मेजर की श्रेणी में हैडमास्टर के रूप में कार्य किया। Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay

शिक्षा के दरवाजे बंद:

सन् 1894 के लगभग दापोली मुनिसिपिल शिक्षा विभाग ने प्रस्ताव पास किया कि अछूत बच्चों को स्कूलों में भर्ती न किया जाएं। अछूत समाज के लोगों ने इसका विरोध कलेक्टर से किया। मुनिसिपल शिक्षा विभाग के प्रस्ताव के मद्दे-नजर सूबेदार रामजी को बच्चों को स्कूल भेजने की चिन्ता सताए जा रही थी।

बालक भीम के साथ के बच्चें स्कूल जाने लगे थे। सूबेदार रामजी ने एक अंग्रेज सैनिक अफसर से इस बात की फरियाद की कि उन्होंने जीवनभर सरकार की सेवा की है, उनके बच्चों को कहीं दाखिला नहीं मिले तो बड़ा अन्याय होगा। अंतत: उस अफसर के कहने पर भीम को केम्प स्कूल में प्रवेश मिल गया। भीम अपने बड़े भाई आनंदराव के साथ स्कूल जाने लगे।

दापोली केम्प:

भीमराव जब पैदा हुए, उनके पिता फौज में नौकर करते थे। भीमराव लगभग 2 साल के रहे होंगे जब उनके पिता सूबेदार रामजी सेना से सन 1894 में अवकाश प्राप्त करके वे 50/- रूपये मासिक पेंशन प्राप्त करने लगे थे। वे अन्य कुछ सेवा-निवृत कर्मियों के साथ केम्प मऊ से अम्बवाडे गांव के पास “केम्प-दापोली” चले आए और वहीं रहने लगे। उम समय वहां पर सैनिकों की बस्ती थी।

💚 दापोली से सतारा केम्प:

सूबेदार रामजी सकपाल सन् 1894 में सेवानिवृत हुए कुछ दिन दापोली में रहकर वे सपरिवार सतारा चले आये। वे अल्पकालीन किसी नौकरी की तलाश में थे। उन्होंने आर्मी में आवेदन किया। सतारा जिले के गोरे गांव स्थित पब्लिक वर्कस डिपार्टमेंट (पी. डब्ल्यू. डी.) विभाग में उन्हें स्टोर-कीपर की नौकरी मिल गई। उनकी प्राथमिक शिक्षा दापोली कैम्प में हुई।

🎯 प्राथमिक शिक्षा:

सरकारी सतारा हाई स्कूल (आज का प्रताप सिंह हाई स्कूल) राजा बाड़ा सतारा में भीमराव का दाखिला 7 नवम्बर 1900 को अंग्रेजी की प्रथम कक्षा में हुआ। स्कूल रजिस्टर क्रमांक 1914 पर उनका नाम भीमा रामजी आंबेडकर अंकित किया गया है।

स्कूल में उनका दाखिला काफी जिद्दोजहद करने पर एक अग्रेंज अधिकारी के हस्तक्षेप से इस शर्त पर हुआ था कि उसे कक्षा से बाहर बैठकर पड़ना पड़ेगा।

इसी स्कूल में गुरूजी कृष्णाजी केशव आंबेडकर (1855-1934) नामक शिक्षक ने भीमराव का उपनाम अम्वावडेकर से बदलकर स्वत: का आंबेडकर उपनाम कर दिया था।

सतारा से मुम्बई:

सूबेदार रामजी सकपाल की नौकरी पूर्ण हुई। तव रामजी सकपाल 1904 में सतारा से बम्बई की लोअर परेल डबक चाल (बी.आई. टी. चाउल कमरा न. 50-51) एलिफिस्टन रोड़ में रहने लगे। भीम कुछ दिनों “मराठा माध्यमिक स्कूल” बम्बई में जाने लगे। उसके कुछ दिन बाद भीम ने बम्बई के ‘एलिफिस्टन हाई स्कूल’ में दाखिला लिया। सन 1907 में मैंट्रिक की परीक्षा पास किया।

सत्य शोधक संस्था ने उनका सार्वजनिक सम्मान समारोह जनवरी माह 1908किया।जिसमें मराठी के प्रसिद्ध लेखक कृष्णजी अर्जन केलुस्कर, विल्सन हाई स्कूल के प्रन्सिपल ने अपनी मराठी में लिखी पुस्तक “गौतम बुद्ध की जीवनी” उपहार में भेंट की। इस समारोह की अध्यक्षता एस. के. बोले ने की।

🎯 स्नातक स्तर की शिक्षा:

इण्टरमीडिएट की परीक्षा पास करने पर धनाभाव के कारण आगे की पढ़ाई रूक गयी। छात्रवृत्ति हेतू कैलुस्कर उन्हें बडोदा महाराज के पास ले गये। राजा ने 25 रू. प्रति माह छात्रवृति देने की घोषणा कर दी। सन 1912 में भीमराव ने बी. ए. पास किया।

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🎯 बडौदा में नौकरी (प्रथम वार):

भीमराव ने स्नातक उत्तीर्ण होने के बाद बड़ौदा संस्थान में नौकरी करने का निश्चय किया। बडौदा रियासत में छूआछूत का वातावरण होंने की वजय से उनके पिता रामजीराव ने उन्हें नौकरी करने से मना कर दिया।

भीमराव आंबेडकरने सयाजीराव गायकवाड द्वारा शिक्षा में आर्थिक सहायता के ऋण से उऋण होने का निश्चय किया। सयाजीराव गायकवाड ने भीमराव को बडौदा राज्य का

“सेना लेफ्टिनैन्ट” के पद पर नियुक्त किया। मात्र 15 दिन नौकरी करने के उपरांत पिता (रामजीराव) के बीमार पड़ने की सूचना पाकर वे बम्बई के लिए रवाना हो गए। भीमराव रास्ते में सूरत रेलवे स्टेशन पर अपने पिताजी के लिए मिठाई लेने के लिए गाड़ी से उतर गये थे।मिठाई खरीदने के बाद जैसे ही वह गाड़ी पकड़ने के लिए प्लेट फार्म पर पहूंचे तो रेलगाड़ी छूट चुकी थी। फिर गाड़ी के छूट जाने पर अगले दिन घर पहूंचे। 2 फरवरी 1913 को उनके पिताजी रामजीराव का शरीरांत हो गया।भीमराव पिता के बिछोह से फूट-2 कर रोने लगे।

🎯 विदेशी शिक्षा:

पिताजी के शरीरांत के बाद आंबेडकर बम्बई में ही रह रहे थे।उन्हीं दिनों महाराजा सयाजीराव गायकवाड ने अपने देश के होनहार बच्चों को अमेरिका से उच्च शिक्षा पढ़ाने की योजना की घोषणा की हुई थी। उनकी योजना के अन्तर्गत भीमराव ने भी तीन अन्य विद्यार्थियों के साथ अमेरिका से उच्च शिक्षा के लिए आवेदन किया।

भीमराव को 11.5 पौंड प्रति माह छात्रवृति तीन साल के लिए 4 जून 1913 को 10 वर्ष की नौकरी रियासत में करने का इकरार-नामा के साथ मंजूर की गई। इस प्रकार 15 जून 1913 से 14 जून 1916 तक की समय सीमा निर्धारित की गई। बाद में छात्रवृति एक वर्ष के लिए अर्थात 14 जून 1917 तक के लिए बढा दी गई।

इस प्रकार आंबेडकर ने विदेशों में कुल चार साल का समय शिक्षा अर्जित करने में लगाया। 21जुलाई 1913 को भीमराव न्यूयार्क अमेरिका पहुंचे। 23 जुलाई 1913 को उन्होंने कोलंबिया विश्वविद्यालय में एम.ए.और पीएच.डी. में दाखिला लिया। अमेरिका और लंदन (इंग्लैंड) में चार साल तक उच्च शिक्षा एम.ए. और पीएच.डी.की डिग्री की प्राप्त की।

🎯 एम. ए.(Master of Art)1915:

18-18 घंटे अध्यन किया करते थे। अमेरिका में उन्होंने राजनीति शास्त्र और अर्थशास्त्र आदि विषय पढ़े। दो वर्ष कठिन किया।विख्यात अर्थशास्त्री प्रो. एडविन आर. ए. सैलिग्मैन उनके अध्यापक थे। 1 जून 1915 में “प्राचीन भारतीय व्यापार”(Ancient Indian Commerce) थीसिस पर उन्हें एम. ए. की डिग्री मिली।

🎯 पी. एच.डी.(Doctor of Philosophy) दर्शनशास्त्र जून 1915:

कोलंबिया में पी.एच.डी. के लिए “नेशनल डिविडैंट आफ इंडिया-ए हिस्टोरिकल एण्ड ऐनालिटिकल स्टडी” { National Dividend of India} अर्थात भारत का राष्ट्रीय लाभांश नाम से भारत की अर्थव्यवस्था पर एक लेख लिखा।यह शोध जून 1916 में कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने स्वीकार कर लिया।

यह पुस्तक अपने शुभ चिन्तक सयाजीराव गायकवाड़ को समर्पित की थी और इसकी प्रस्तावना प्रो. एस. ऐ. सेलिग्मैंन अर्थशास्त्री ने लिखी थी।

उनकी इस सफलता पर मुग्ध होकर उनके साथियों और प्रोफेसरों ने मिलकर उनको शानदार डिनर दिया। बडौदा के महाराज सयाजीराव ने भी उन्हें तार द्वारा बधाई संदेश दिया था।

आठ साल बाद 1924 में बिर्टिश भारत में प्रान्तीय अर्थ व्यवस्था का विकास(The Evolution of provincial Finance in British India) के नाम से यह थीसिस मेसर्स पी. एस. किंग एण्ड संस(लंदन) के द्वारा एक पुस्तक के रुप में प्रकाशित हुई।प्रकाशित ग्रन्थ की कुछ कापियां कोलंबिया यूनिवर्सिटी को जमा की। इस प्रकार सन 1924 में विधिवत डिग्री मिली।

🎯 लंदन में शिक्षा हेतू गमन:

उन्होंने जून 1916 में अमरीका छोड़ दिया और लंदन के लिए रवाना हो गये। उन्होंने लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स एण्ड पालिटिकल कालेज में तुरन्त प्रवेश ले लिया।उनके अर्थशास्त्र के ज्ञान से प्रभावित होकर लंदन स्कूल के प्रो. ने उन्हें डी. एस. सी. के लिए कार्य करने की अनुमति की गयी।

छात्रवृति समाप्त होने पर लंदन से एम.एस.सी. और डी.एस.सी. की अधूरी शिक्षा को बीच में छोड़कर पुन: विश्वविद्यालय से अधूरी शिक्षा को चार साल के अन्तर्गत पूरी करने की स्वीकृति प्रो. केनन से 4 वर्ष के भीतर पुनः आने की अनुमति प्राप्त की जिससे वे अपने शोध को पुरा कर सकेंगे।अन्त में वे 21अगस्त 1917 को भीमराव लंदन से बम्बई पहुंचे।

🎯 बडौदा में नौकरी (दूसरी वार):

“बड़ौदा सरकार के साथ किये गये इकरारनामा के अनुसार नौकरी करने के लिए आंबेडकर ने बड़ौदा रवाना होने का निश्चय किया। परन्तु बड़ौदा का टिकट लेने के लिए भी उनके पास पैसे नहीं थे। दुख में सुख के अनुसार उनके सागर में नष्ट हुए सामान के मुआवजे के रूप में ‘थांमस कुक कम्पनी’ ने डा.अम्बेडकर को 600 रूपये दिये। वे पैसे उस समय उनके काम आ गये। उनमें से आधे पैसे अपनी पत्नी को घर खर्च चलाने के लिए दिए,आधे पैसे उन्होंने खुद के खर्च के लिए रखे और वे बड़ौदा जाने के लिए तत्पर हुए।”

डा.भीमराव आंबेडकर ने अपने आने की सूचना महाराजा सयाजीराव गायकवाड को भेजकर बडौदा के लिए रवाना हुए। महाराजा का आदेश था कि एक सेवक(कर्मचारी) उन्हें लेने बडौ़दा रेलवे स्टेशन पहुंचेगा। डा. आंबेडकर रेलगाडी़ से नियत समय पर पहुंचे। वे घंटों वहां पर उनको लेने वाले का इन्तजार करते हुए रात होने पर स्टेशन से बाहर आए।

अपने ठहरने के लिए वे तीन होटलों में गए, मगर जाति से महार होने के कारण किसी भी होटल वाले ने उन्हें ठहरने नहीं दिया।अन्त में निराश होकर डा.आंबेडकर ने रात किसी तरह बाहर ही गुजारी।अगले दिन सुबह होने पर डा. अम्बेडकर 11 सितम्बर 1917 को रियासत में पहुंचे और महाराजा से मिले। महाराजा ने उनका स्वागत किया।उनकी योग्यता से प्रभावित होकर महाराजा ने अपने राज्य का ‘वित्त मंत्री’ बनाना चाहा।

मगर सभी अन्य अधिकारियों ने प्रबल विरोध में कहा-“अछूत को आप वित्त मंत्री का पद न दें। बडौ़दा स्टेट में गडबड़ी फैल जायेगी। लोग बगावत कर देंगे।” हारकर महाराजा बडौदा ने डा.अम्बेड़कर को 11सितम्बर 1917 को विधिवत बड़ौदा रियासत का ”सेना सचिव” पद पर नियुक्त किया। वे इसके साथ ही वित्तीय विभाग भी सभालने लगे।

आज भी बाबा साहब का वह नियुक्ति पत्र बड़ौदा में सक्रिय रूप से कार्य करने वाले राजकुमार सिंह के अनुसार ‘संकल्प भूमि ट्रस्ट बड़ौदा’ के पास मौजूद है।उसी दिन उन्होंने कार्यालय में अपना कार्यभार सभाला, मगर वहां उनका न कोई उनका साथ देता था और न ही कोई उनकी आज्ञा का पालन करता था। लोग अक्सर कहते थे “चमार-महार का हुक्म नहीं मानेंगे।आंबेडकर कार्यालय में वित्तीय व्यवस्था भी संभालने लगे।

वे प्रत्येक विभाग में आर्थिक अव्यवस्था से परिचित होने लगे। बड़ौदा सरकार के कर्मचारियों और अधिकारियों ने अपने आप पर लगते अंकुश को देख डा.भीमराव आंबेडकर के खिलाफ जातीयता का माहौल पैदा करना शुरू कर दिया।डा.आंबेडकर तंग आकर महाराजा से मिलेऔर अपने साथ होने वाले दुर्व्यहार से अवगत कराया। इस पर अपनी असमर्थता प्रकट करते हुए महाराजा ने कहा, हमने सबको कहा तो है,पर सवर्ण हमारी आज्ञा का पालन नहीं करते हैं।

उन्होंने महाराजा से अपने लिए मकान की व्यवस्था के लिए भी निवेदन किया। महाराजा ने कहा, इस पर विचार किया जायेगा। जव भीम को सम्पूर्ण बडौदा शहर में रहने के लिए किसी भी होटल और हास्टल में जगह नहीं मिली।

तव बाबासाहेब बड़ौदा रेलवे स्टेशन से लगभग 3 किमी. दूरी पर पूर्व दिशा में वर्तमान में फतेगंज नाम का एक मौहल्ला है,तत्कालीन समय में वहां पर पारसी अधिक संख्या में निवास करते हैं। इसी मौहल्ले में पारसी लोगों की एक धर्मशाला हुआ करती थी, जहां पर बाबा साहेब किरायेदार के रूप में अपना नाम बदल कर एदल सोराबजी के नाम से रू. 2/- प्रतिदिन के किराये से रहने लगे।

Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichayनाम बदलने की युक्ति धर्मशाला के एक नौकर ने अधिक पैसे लेकर बतलायी थी। डा.आंबेडकर के नाम बदलने की युक्ति कुछ दिन भी न चल सकी ? किसी प्रकार पारसियों को मालूम हुआ कि धर्मशाला में एक अस्प्रश्य (महार) रहने लगा है, जिससे उनकी धर्मशाला अपवित्र हो रही है।डा.अम्बेडकर को धर्मशाला में रहते हुए अभी 11 वां दिन था। यह घटना 23 सितम्बर 1917 के दिन है कि 15-20 क्रोधित पारसियों ने धर्मशाला को घेर लिया। भीमराव के साथ भीषण अभद्र व्यवहार करके धर्मशाला को आठ घंटे के अंदर खाली करके चले जाने को कहा।इन लोगों ने डा. आम्बेडकर का सामान भी निकालकर फेंक दिया।

” इस प्रकार भीषण सामाजिक विषमताओं,अस्पृश्यता, ऊंच-नीच के भेद भाव के कारण अपमानित व निराश होकर भीमराव ने अपनी नौकरी से बिना त्यागपत्र देकर बडौदा छोड़ने का निर्णय लिया।अन्तत: असहाय होने पर नौकरी से बिना त्यागपत्र दिये ही धर्मशाला को खाली कर दिया।बंबई के लिए आने वाली रेलगाड़ी लगभग 4-5 घंटे देरी से आने के कारण डा. आंबेडकर ने यह समय दिनांक 23 सितम्बर 1917 को एक सुरक्षित जगह एवं एकांत जैसा स्थान सयाजी बाग(कमैटी बाग) बड़ौदा में एक वट-वृक्ष के नीचे बिताया।

भूख प्यास से व्याकुल होकर वे वहां पर फफक-फफक कर रोते हुए चिन्तन-मनन करने लगे कि “मेरे जैसा उच्च शिक्षा प्राप्त एवं विद्धान इस देश में इतना अपमानित है,तो मेरे समाज के गरीब लोगों की क्या हालत होगी?” तभी डा.आंबेडकर ने यह संकल्प किया कि “मैं ऐसी व्यवस्था को बदल डालूंगा,जिसके कारण देश भर में अछूत वर्ग गुलाम है, शोषित समाज जो सदियों से सताया जा रहा है, के उत्थान एवं मुक्ति के लिए जीवन भर कार्य करूंगा तथा सामाजिक विषमताओं को मिटाने के लिए आजीवन संघर्ष करता रहूंगा।” रेलगाड़ी के आने का समय होने पर वे बडौ़दा से बम्बई आ गये। Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay

कुछ दिनों बाद बाबा साहेब ने बम्बई के सिडेनहम कालेज में प्रोफेसर की नौकरी कर ली।बड़ौदा के शिक्षा विभाग ने सिडेनहम कालेज बम्बई के प्रिन्सिपल से और बम्बई सरकार के शिक्षा विभाग से डा.आम्बेडकर की शिकायत की।जब महाराजा सयाजीराव गायकवाड को अपनी रियासत के अधिकारियों की इस करतूत का पता चला, तो उन्होंने शिक्षा विभाग को कुछ भी ना करने से मना कर दिया।

इस संकल्प भूमि का प्रचार-प्रसार संकल्प भूमि ट्रस्ट बड़ौदा यहां पर साल में अनेकों कार्यक्रम आयोजित करके लोगों का मार्ग प्रशस्त करती है। इस स्थान का दर्शन करने से बच्चे,नौजवान और बूढों में भी ऊर्जा का संचार होता है,सभी के अन्दर बाबा साहेब के दुख-दर्द का आभास होता है। बाबा साहेब की संकल्प भूमि से प्रेरणा लेकर देश में व्याप्त असमानता और गुलामी का खात्मा करने की भावना जाग्रत हो जाती है।

🎯 एम. एस.सी.{Master of Science} (जून 1921) लंदन:

Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay. अक्टूबर 1916 में कानून की पढाई के लिए ग्रेज इन में दाखिला ले लिया।उसी समय डा. आंबेडकर लंदन से बी.एस. सी. न होने के कारण एम. एस. सी. के दाखिले में आपत्ति आयी। भीमराव ने लंदन विश्वविद्यालय में एम. एस. सी. में बैठने की अनुमति मांगी कि मैंने कोलंबिया में अर्थशास्त्र का काफी अध्ययन किया है, इसलिए मुझे सीधे एम. एस. सी. में बैठने की अनुमति दी जाय।तव जाकर डा. आंबेडकर को लंदन स्कूल आफ इकोनॉमिक्स एण्ड पोलिटिकल साइस में प्रवेश दिया।

इसकी सूचना बडौदा नरेश को भेज दी।कुछ महीना अध्ययन करने के उपरांत बडौदा से मिलने वाली छातृवृति की सीमा खत्म हो गयी।डा. आंबेडकर ने बडौदा नरेश से दो वर्ष तक छातृवृति बढाने की मांग की । मात्र एक वर्ष की छातृवृति मिलने की अनुमति मिली।एम. एस. सी. की एक साल की पढाई करने पर छातृवृति की सीमि समाप्त हुई। जिससे पढाई को बीच में छोड़ कर भारत आना पडा।

चार साल पूरे होने से पहले ही लंदन आकर दुबारा पढाई करने लगे। जून 1921 में लंदन विश्वविद्यालय को “ब्रिटिश भारत में प्रान्तीय जमाबंन्दी” नामक शोध प्रस्तुत किया। इस शोध में बाबा साहब ने सिद्ध किया है कि किस प्रकार ब्रिटिश सरकार द्वारा पूरा पैसा शिक्षा व उद्योग की बजाय नौकरशाही पर खर्च किया जाता है।

🎯 डी. एस.सी.(Doctor of Science) (23मार्च 1923) लंदन:

भीमराव आंबेडकर अपनी प्रो. की कमाई और कोलापुर छत्रपति साहूजी महाराज की सहायता से लंदन में पढाई के लिए गये। प्रो. की नौकरी छोडकर बाबा साहब लंदन पहुंचे। उन्होंने 23 मार्च 1923 को डी. एस.सी. लंदन की डिग्री के लिए अपनि थीसिस “द. प्रोब्लम आफ रूपी इटस ओरिजन एण्ड इटस सोल्यूशन” प्रस्तुत किया। थीसिस में लिखा है- किस प्रकार ब्रिटिश शासकों ने भारतीयों के रूपये को पोंड़ के साथ जोड़कर ,स्वंय लाभ कमाया और भारत में आर्थिक संकट पैदा कर दिया।इस लेख में ब्रिटिश शासकों की बहुत आलोचना की है।

विश्व विख्यात समाजशास्त्री अर्थशास्त्री हेराड लास्की ने भी इस शोध की प्रसंशा की है। थीसिस के बाद वह बोन विश्वविद्यालय जर्मन में अध्ययन हेतू लौट आए। लगभग नौ महीने बाद प्रो. एडविन केनन ने वापिस बुलाकर विवादपर्ण शोध पुनः लिखने को कहा। 14अप्रैल 1923 बाबा साहब बम्बई लौट आये।

बम्बई आकर अपना शोध पुनः लिखा।लंदन विश्वविद्यालय ने शोध को स्वीकारते हुए डी. एस. सी. की डिग्री प्रदान की।
डा. आंबेडकर ने यह यह थीसिस अपने माता-पिता को भेंट किया और भेंट के शब्दों में लिखा- मैं (यह पुस्तक) अपने माता-पिता की उनकी ओर से मेरे लिए किये बलिदान तथा पढाई में उनकी ओर से दिखाये गये प्रकाश के कृतज्ञता स्वरूप भेंट करता है।

🎯 बार-एट ला-1922 (बैरिस्टर की उपाधि)

बैरिस्टर की उपाधि प्राप्त करने के लिए 11नवम्बर 1916 को ग्रेज इन लंदन मेंअपना नाम लिखवाया। जिस प्रकार उनको छातृवृति के बंद हो जाने से एम.एस. सी. के शोध प्रबन्ध को पूरा करने में रूकावट आयी , उसी प्रकार बैरिस्टर की पढाई में खयी। सन 1222 में बार-एट.ला की परीक्षा उतीर्ण कर डिग्री प्राप्त की।

🎯 बाबासाहेब डा.भीमराव अम्बेडकर की असीम देश भक्ति: बाबासाहेब कहते हैं “मैं पहले भी भारतीय हूं और बाद में भी भारतीय हूं।”

🎯 गोलमेज सभा में देशभक्ति:

“गोलमेज सम्मेलन में आजादी मुझे भी प्यारी है मैं भी चाहता हूं मुझे भी यह कहने की आज्ञा दिजिए कि लंदन की गोलमेज सभा में आजादी के लिए जितना मैं लड़ा और झगड़ा हूं और अंग्रेजी हुकुमत की मैंने जितनी नुकताचीनी (फजीहत) की है वैसी किसी ने नहीं की लेकिन मैं देश की आजादी से जरूरी अपने अछूत भाईयों की आजादी समझता हूं।”

“भले ही भारत में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिन्हें समाज ने कुचला हुआ है, उन्हें मानव भी नहीं समझा जाता परन्तु हम सभी अन्यायों और मनुष्यता से घिरी कुछ बातों के बावजूद भारत को अंग्रेजी साम्राज्य से स्वतंत्रता मिलनी ही चाहिए” पूर्वजों द्वारा सदियों से घोर अपमान को सहन करने पर भी बाबा साहब अपने देश की आजादी के लिए डटे रहे। अन्त में अंग्रेजों को भारत स्वतंत्र करना ही पड़ा।

🎯 पाकिस्तान पर विचार:

फरवरी 1942 को बम्बई विधान सभा की एक बहस में पाकिस्तान के सम्बन्ध में बोलते हुए कहा- ” मैं शपथ लेता हूं कि में अपने देश की रक्षा के लिए अपना जीवन निछावर (कुर्बान) कर दूंगा।”

🎯 दामोदर नदी पर बांध:

अंग्रेजी शासन काल में बाबासाहेब की शिक्षा और योग्यता को महत्व देते हुए वायसराय कार्यकारणी समिति ने सन 1942 में उन्हें अपनी काउन्सिल में ‘श्रम मंत्री’ बनाया । उसी कार्यकाल में दामोदर नदी की वर्षा काल में तबाही से बचने एवं बिहार से कलकत्ता जाने के लिए 300 से 400 मील का चक्कर लगाकर जाना पड़ता था, इस आपत्ती से बचने के लिए वायसराय लार्ड बेवल ने नदी पर बांध बनाने के लिए डा.आंबेडकर को कहा- वह चाहते थे कि इस कार्य के लिए इंग्लैंड से इन्जीनियर आये।

बाबा साहब ने देश हित को ध्यान में रखते हुए निम्न तर्क देकर मना किया कि “इंग्लैंड छोटा देश छोटी नदियां की वजय से वहां का इन्जीनियर कामयाब नहीं है।” यह तर्क बाबा साहब ने अपने देश के इन्जीनियर के द्वारा इस कार्य को करने के लिए दिया। इस कार्य के लिए बाबासाहेब ने अपने ही देश के इन्जीनियर खोसला (पंजाब) को आमंत्रित किया। तब बाबा साहेब ने उससे कहा-

“मैं राष्ट्र भक्त हूं और भारत भूमि से मुझे प्यार है। भारत की सुरक्षा को ध्यान में रखकर ही मैंने आपको चुना है।”

♥️ अभूतपूर्व योगदान: वाईसराय की कार्यकारिणी सभा( Viceroy’s Excil) में सदस्य की् अर्थशास्त्र प्रशासक के रूप में उभर कर आये, तब उन्होंने निम्नलिखित क्षेत्रों में उनका अभूतपूर्व योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा-
1. मजदूर कल्याण
2. रोजगार
3. कोशल विकास (skill development)
4. ऊर्जा
5. जल प्रबन्धन
6. खनिज संसाधन प्रबंधन; और
7. लोक निर्माण.एक आदमी के अन्दर अनगिनत प्रतिभाएं थीं।

🎯 विकास योजनाएं:

बहुत सारी विकास योजनाओं के सूतत्रपात्र बाबा साहेब थे। इनमें
दामोदर घाटि परियोजना,
हीरा कुण्ड परियोजना,
सोन नदी योजना
आदि शामिल हैं। लेकिन श्रेय दूसरों को दिया गया।

🎯 जम्मू-कश्मीर धारा 370 पर बाबासाहेब डा.आंबेडकर की देश भक्ति:

कश्मीरियों को सम्पूर्ण भारत में बराबरी के अधिकार मिले लेकिन उसी भारत और भारतीयों को कश्मीर में बराबरी का कोई अधिकार नहीं है।
जब नेहरू ने उक्त धारा के complaint के लिए कश्मीर नेता शेख अब्दुल्ला को बाबासाहेब के कार्यालय भेजा। तव बाबा साहेब ने उसे यह कहते हुए आफिस से भगा दिया- Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay

“मैं भारत का कानून मंत्री हूं और इस भारत विरोधी धारा-370 को मंजूरी देकर कम से कम मैं तो अपने देश से गद्दारी नहीं कर सकता।”
यह कहकर शेख अब्दुला को अपने आफिस से निकाल दिया। अलोकतांत्रिक तरीके से नेहरू ने गोपाल स्वामी अय्यगंर से इस भारत विरोधी धारा को भारत के संविधान में डलवाया जिसका खामियाजा देश आज तक भुगत रहा है।

🎯 अपने प्रतिनिधित्व की वलि देकर देश भक्ति का परिचय:

बाबासाहेब ने अपने सम्पर्ण जीवन के संघर्षो के परिणाम स्वरूप गोलमेज सम्मेलन लंदन से 17 अगस्त 1932 को प्राप्त होने वाले दोहरे वोट के अधिकार की वलि देकर गांधी की जान बचाकर देश को टूटने से बचाया। 24 सितम्बर 1932 को पूना पैक्ट पर हस्ताक्षर करके अपने प्रतिनिधियों के स्वयं चुनने का अधिकार छोड़ने पर संयुक्त प्रणाली को स्वीकार किया, जिसका खामियाजा अछूत वर्ग आज तक भुगत रहा है।बाबा साहेब भी इस संयुक्त मतदान की वजय से लोक सभा के दोनों चुनाव हार गये। तभी से सुरक्षित सीटों पर गुलाम लोग जीतकर आने लगे।
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🔹 मार्च 1946 के चुनाव में एकमात्र जोगेंद्रनाथ मंडल (शे.का.फे.) फिरोजपूर पटूआ खाली चुनाव क्षेत्र से चुनाव जीते (30 आरक्षित सिटों में – 26 पर कॉग्रेस, 3 निर्दलिय और 1 SCF)

🔹 *19 मई, 1946 को दिल्ली में All India Schedule Caste की बैठक बुलायी गयी जिसका विषय था, बाबासाहब को संविधान सभा के होने वाले चुनाव में कहा से प्रत्याशी बनाया जाये ताकी वे जीतकर संविधान सभा में पहुंच सके और बहुजन समाज के हक और अधिकार स्वतंत्र भारत के संविधान में सुरक्षित कर सके।

🔹 जब किसी ने जिम्मेवारी नहीं ली तो, पश्चिम बंगाल से जोगेंद्रनाथ मंडलजी द्वारा भेजे गये दो प्रतिनिधीओं द्वारा बाबासाहब को बंगाल से प्रत्याशी बनने का अनुरोध किया गया, जिसे बाबासाहब ने स्विकार किया| Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay

🔹 अब बाबासाहब के चुनाव प्रचार की और उन्हें संविधान सभा के चुनाव में जिताने की पूरी जिम्मेदारी जोगेंद्रनाथ मंडल जी पर थी।

🔹 30 जून, 1946 को बाबासाहब बंगाल की एक सभा मे अपने भाषण मे कहते है- “अब समय आ गया है कि हम लोग अपने आपसी मन-मुटाव व छोटी-छोटी बातों को भुलाकर, एकत्र होकर, संगठित होकर अपने दलित वर्गो के हितों की सुरक्षा के लिए भावी भारत के नए संविधान के निर्माण में सहयोग करें तथा इस बात के लिए जागरूक रहें कि हिंदू बाहुल्य वाली संविधान सभा में कहीं हमारे हितों का बलिदान ना हो जाए और सदा-सदा के लिए उनके गुलाम ही न बन जाएं।”

🔹 17 जुलाई, 1946 को बंगाल विधान परिषद द्वारा संविधान सभा के लिए अपने प्रतिनिधियों का चुनाव होना था। बाबासाहब के खिलाफ कॉग्रेस ने सी.आर.ठाकुर को नामित किया था तथा दलित वर्ग के ही एक विद्रोही गुट के व्यक्ति एम.बी.मलिक को शेड्यूल्ड कास्ट एसोसिएसन का प्रत्याशी बनाया गया था। Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay

🎯 संविधान रचनाकार:

किसी देश की शासन-सत्ता को चलाने के लिए एक संविधान की आवश्यता होती है। जिसके नियमोंऔर कानूनों का पालन करना नितांत आवश्यक होता है। जिससे देश में अमन और शान्ति व्यवस्था कायम होती है। ऐसी ही इस देश की कानून की किताब ” भारतीय संविधान” है। जिसके रचनाकार बाबासाहेब डा.भीमराव आंम्बेडकर रहे है़ं।

बाबासाहेब ने संविधान को चार स्तम्भों- समता, स्वतंत्रता,बन्धुत्व और न्याय पर टिकाया है। “भारत और भारत से बाहर डा.आंम्बेडकर संविधान-संरचना के मर्मज्ञ एवं विशेषज्ञ के रूप में प्रख्यात हैं। उन्हें भारतीय संविधान का जनक होने का सर्वथा उचित एवं अपेक्षित गौरव प्राप्त है।

15 जुलाई 1947 को ब्रिटिश पार्लियामेंट ने भारतीय स्वाधीन एक्ट पास कर दिया। भारत की स्वतंत्र कैबिनेट में डा.आंम्बेडकर को कानून मंत्री बनाया गया।15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हो चुका था। सबसे गंभीर समस्या यह थी कि देश के लिए संविधान की रचना किसके द्वारा कराई जाए। कांग्रेस के शीर्ष नेतागण इस सम्बन्ध में विचार-विमर्श में व्यस्थ हो गये। उन्हें चिन्ता सताने लगी आखिर संविधान विशेषज्ञ कहां से लाएं।

अन्त में उन्होंने ऐशिया के अनेकों देशों के संविधान लिखने वाले आवर जैनिंग को आमंत्रित करने का निर्णय लिया।यह संदेशा विजय लक्ष्मी पंडित के जरिए दिया, जो उस समय यू.एन. ओ. की जनरल असेम्बली की अध्यक्ष थीं। लेकिन जैनिंग ने कहा कि आपके देश में डा.आंम्बेडकर जैसा कानून का पंडित कोई नहीं है, उनको संविधान लिखने के लिए बुलाओ।

गांधी जी ने नेहरू को बताया हमारे ही देश में संविधान विशेषज्ञ हैं। वह व्यक्ति डा.आंम्बेडकर हैं। उनहोंने संविधान के सम्बन्ध में गोलमेज सम्मेलन में भी काम किया था,” गांधी जी ने इसकी जानकारी दी। सभी कांग्रेस के नेता डा.आंम्बेडकर के ज्ञान से पहले से ही परिचित थे।
तव बाबासाहेव को मजबूरी में संविधान लिखने के लिए नेहरू और गांधी ने कहा। Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay.

🎯 29 अगस्त 1946 को संविधान प्रारूप समिति का गठन:

बाबासाहेव को इस समिति का अध्यक्ष (चैयरमैन) बनाया गया। सविधान सभा के 296 सदस्यों में से समिति में प्रारूप समिति में 6 अन्य सदस्य भी नियुक्त किये गये।
उनके नाम निम्न प्रकार थे-
1: अल्लादि कृष्णा स्वामी अय्यर
2: एन.गोपाला स्वामी अय्यर
3: के. एम. मुन्शी
4: सैय्मद मुहम्मद सादुल्ला
5: बी.एल. मित्तर
6: डी.पी: खेतान
ये छ: सदस्य नाम मात्र के थे। संविधान का सारा कार्य बाबासाहेब ने ही किया।

🎯 ड्राफटिंग कमेटी की प्रथम बैठक:

30 अगस्त 1946 को ड्राफटिंग कमेटी की प्रथम बैठक हुई तब से 141 दिन की बैठकें हुई जिसके दौरान 315 अनुच्छेदों और 8 अनुसूचियों वाली संविधान ड्राफ्ट किया गया। बाद में इसकी संख्या 386 हो गई और संविधान लागू होते-2 अनुच्छेदों की संख्या बढकर 395 धाराएं और 8 अनुसूचियां हो गई।

बाबा साहेब ने 21 फरवरी 1948 संविधान का मसौदा संविधान- सभा के अध्यक्ष के पास भेजा। संविधान का मसौदा 04 नवम्बर 1948 को मसौदा को संविधानसभा के पास 8 महा सुझाव एवं संशोधन के लिए भेजा जिससे मसौदे पर चर्चा हुई। जिसे संविधान का प्रथम वाचन (First Reading of Draft Constitution) कहा जाता है।

संविधान का दूसरा वाचन (2nd Reading of Draft constitution) 15 नवम्बर 1948 को शुरू हुआ। जिस पर विस्तार से चर्चा हुई। 14 नवम्बर1949 संविधानसभा तीसरे वाचन (3rd&Last Reading of Draft Constitution) के लिए बैठी। जो 26 नवम्बर 1949 को समाप्त हुई। इसी दिन संविधान को संविधानसभा ने पास कर दिया।

संविधान के इस अंतिम रूप में 395 अनुच्छेद और 8 अनुसूचियां थीं। संविधान निर्माण में (09.12.1946 से 26.11.1949) तक 2 साल 11 माह 18 दिन का समय लगा। उस समय संविधान का वजन 15÷2 (साढे सात ) शेर था। इस संम्पूर्ण अवधि में बाबा साहेब ने अपने स्वास्थ्य की परवाह न करते हुए रात-दिन जागकर बडी ही मेहनत से संविधान निर्माण के कार्य को पूरा किया।

इसलिए उनको संविधान का शिल्पकार कहा जाता है। 25 नवम्बर 1949 को संविधान के तीसरे वाचन में बाबा साहेब ने संविधानसभा में अपने आने का कारण स्पस्ट करते हुए कहा-

” मैं विधान परिषद में क्यों आया ? केवल अछूत वर्ग की रक्षा करने के लिए। इससे अधिक मुझे कोई आकांक्षा नहीं थी। यहां आने पर मुझे इतनी बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जायेगी, इसकी मुझे कल्पना तक नहीं थी। विधान परिषद ने जब मुझे मसविदा -समिति में नियुक्त किया, तब तो मुझे आश्चर्य हुआ ही, परन्तु जब मसविदा -समिति ने मुझे अपना अध्यक्ष चुना, तो मुझे आश्चर्य का धक्का सा लगा। विधान परिषद और मसविदा-समिति ने मुझ पर इतना विशावास करके मझसे यह काम करवा लिया और देश की सेवा करने का अवसर मुझे दिया, इसके लिए मैं उनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करता हूं।”

🎯 संविधान दिवस :

26 नवम्बर 1949 को संविधान विधिवत संविधानसभा के अध्यक्ष डा. राजेन्द्र प्रसाद को सौंप दिया था। जिस पर संविधानसभा के अध्यक्ष ने हस्ताक्षर कर किए।इसीलिए इस दिन को “संविधान दिवस” के नाम से जानते हैं। वैसे तो उस दिन से ही देश में भारतीय कानून लागू होना चाहिए था, लेकिन कांग्रेस ने अपने देश के लिए ‘पूर्ण स्वराज्य’ की मांग रावी नदी के तट पर 26 जनवरी 1929 को दृढता से की थी।उस समय कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष पंडित जवाहर लाल नेहरू थे।

कांग्रेस ने उस 26 तारीख और जनवरी महीना को ऐतिहासिक बनाये रखने के लिए ही भारतीय संविधान को स्वीकारने के 2 महीना बाद 26 जनवरी 1950 से लागू किया था।

🎯 संविधानसभा में चेतावनी देते हुए कहा था-

” संविधान कितना भी बेहतर हो, यदि उस पर अमल करने वाले निकम्मे हो, तो वह बुरा हो सकता है। यदि इसे अमल करने वाले अच्छे हैं, तो बुरा संविधान भी अच्छा हो सकता है।”

🎯 भारतीयों को कठोर शब्दों में सावधान करते हुए डा.आंम्बेडकर:

“26 जनवरी 1950 को हम राजनीतिक रूप में समान और सामाजिक एवं आर्थिक रूप में असमान होंगे। जितना शीघ्र हो सके हमें यह भेदभाव और पृथकता दूर करनी चाहिए यदि ऐसा न किया गया तो वह लोग जो इस भेदभाव का शिकार हैं राजनीतिक लोकतंत्र का धज्जियां उड़ा देंगे जो इस संविधान सभा ने इतनी मेहनत से बनाया है।”

🎯 बाबा साहेब ने देश की आजादी की चिन्ता व्यक्त करते हुए कहा-

“26 जनवरी 1950 को देश स्वतंत्र हो जायेगा, परन्तु उसकी स्वतंत्रता का क्या होगा ? क्या वह अपनी स्वतंत्रता कायम रखेगा या पुन: खो देगा ? उनका इशारा था कि अतीत में आन्तरिक गड़बड़ियों, गद्दारियों और विश्वासघात के कारण देश एक बार अपनी आजादी खो चुका है, यदि हमने सबक नहीं लिए तो देश को पुन: गुलाम होने से कोई नहीं बचा पाएगा।”
उन्होंने आगे कहा-“अत: अपनी स्वतंत्रता को खून की अन्तिम बूंद तक हमें रक्षा करने हेतु दृढ संकल्प लेना चाहिए।”

🎯 गणतंत्र दिवस:

26 जनवरी 1950 के दिन को कहते हैं। आज से देश का शासन भारतीय संविधान के कानून से चलना शुरू हुआ।

🎯 सर्वोत्तम संविधान निर्माता:

5 जून 1952 को संसार के सर्वोत्तम संविधान निर्माता के रूप में डा. भीमराव आंम्बेडकर को अमेरिका कोलंबिया विश्वविद्यालय ने ( डाक्टर आफ लाज एंड लिटलेचर (एल. एल. डी.) उपाधि से सम्मानित किया।

🎯 बौद्ध धम्म अंगीकार:

Baba Saheb Dr Bhimrao Ambedkar Jeevan Parichay. बाबा साहेब ने नागपुर की पवित्र भूमि पर 14 अक्टूबर 1956 में पूर्वजों का ‘बौद्ध धम्म’ स्वीकार किया। जो भारत की मिट्टी में जन्मा और बढा हुआ। जिससे इस देश पर किसी भी प्रकार का कोई दबाब नहीं आया। बाबा साहेब ने अपना और अपने देश वासियों का सिर दूसरे देशों की तरफ नहीं झुकाया बल्कि संसार के दूसरे देशों का सिर भारत की तरफ झुका । भारत को बौद्ध धम्म की वजय से ही “विश्व गुरू” की ख्याति प्राप्त हुई।

🎯 चन्द्रपुर की बौद्ध धम्मदीक्षा:

16 अक्टूबर 1956 को लगभग ढाई लाख लोगों को बौद्ध धम्म की दीक्षा देकर भगवान बुद्ध की मंगलकारी शरण प्रदान करायी।

🎯 बाबा साहेब ड़ा. भीमराव अम्बेड़कर का देश पर भारी एहसान:

“यदि बाबा साहेब का मुंख मक्का-मदीना की तरफ हो जाता तो इस देश में हिन्दू और मुस्लिमों में ईंट से ईंट बज जाती। यदि उनका मुंह यूरेशलम की तरफ हो जाता तो अंग्रेज आज तक भी देश से नहीं जाते। यह देश आज तक भी गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ होता। बाबा साहेब ने यह कार्य इसलिए नहीं किया क्योंकि वह महान देश भक्त थे।”

🛑 डॉ.बाबा साहेब आंबेडकर के बारे में दुनिया क्या कहती है-

अमेरिका:- “बाबा साहेब हमारे देश मे जन्मे होते तो हम उन्हें सूर्य कहते।”
-राष्ट्रपति ओबामा.

साऊथ आफ्रिका:- “भारत से लेने लायक एक ही चीज़ है!वह है डॉ.अआंबेडकर द्वारा लिखा संविधान।”
-नेल्सेन मंडेला

हंगरी :- “हमारी लड़ाई हम बाबा साहेब आंबेडकर की क्रांति के आधार पर लड़ रहे हैं।”

नेपाल:-“हमारा आने वाला संविधान भारतीय संविधान पर आधारित होगा।”
-PDC

पाकिस्तान:-“अगर हमारे देश में बाबा साहेब रहे होते तो हमें धार्मिक कट्टरता मिटाने में आसानी होती”
(B Cel inPAK)

इंग्लैण्ड:-“अगर भारत को पूर्ण स्वतंत्रता चाहिये तो डॉ.अआंबेडकर जैसे अनुभवी, निष्पक्ष राजनीतिज्ञ और समाजशास्त्री को संविधान सभा में होना ही चाहिये।”
-गवर्नर जनरल(आज़ादी से पहले)

जापान:- “डॉ.अंबेडकर ने मानवता की सच्ची लड़ाई लड़ी थी।”
– वाकायामा प्रान्त के गवर्नर शिनाबु निसाका

10 सितम्बर 2015 को बाबा साहेव की 125 वीं जयन्ती वर्ष में ‘कोयसाना विश्वविद्यालय वाकाम प्रान्त जापान’ में उनकी ब्रांज से बनी पूर्णाकृति प्रतिमा का अनावरण महाराष्ट्र के मुख्य मंत्री देवेन्द्र फडणवीस एवं वाकायामा प्रान्त के गवर्नर शिनाबु निसाका द्वारा प्रतिमा का लोकार्पण किया गया।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी अमेरिका:- “हमें गर्व है कि हमारी यूनिवर्सिटी में एक ऐसा छात्र पढ़ा जिसने भारत का संविधान लिखा।”
(यूनिवर्सिटी में मूर्ती स्थापना करते वक्त यूनिवसिर्टी प्रमुख)

🎯 बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली कुशीनगर के दर्शन:

नेपाल से आते हुए 30 नवम्बर1956 को बाबा साहेब ने बुद्ध की महापरिनिर्वाण स्थली के दर्शन करके उसी दिन 4 बजे सफदरजंग हवाई अडडे दिल्ली पहुंचे। वे काफी थके नजर आ रहे थे।

🎯 कला प्रदर्शनी मथुरा रोड़ दिल्ली का अवलोकन:

1 दिसम्बर 1956 शनिवार को बाबासाहेव ने भगवान बुद्ध की प्रतिमा के समक्ष नमन किया। बुद्ध की 2500वीं जयन्ती के उपलक्ष्य में भारत सरकार के द्वारा वर्तमान प्रगति मैदान, मथुरा रोड़ वाले स्थान पर अर्थात सर्वोच्च न्यायालय के पीछे लगी प्रदर्शनी देखने गये। यह प्रदर्शनी बहुत कलापूर्ण तरीके से लगाई गई थी। मेरे बुद्ध महान हैं, मेरे बुद्ध महान हैं।इस वाक्य को दोहराते हुए वे वहां से चल दिए।

थोड़ी देर बाद वे कनाट प्लेस जा पहुंचे, वहां से अपनी मन पसंद पुस्तकें खरीदीं और वापिस अपने घर आ गए। घर आकर उन्होंने रत्तू जी को टाईप का कुछ काम सौंपा और स्वंय अध्ययन करने में व्यस्त हो गये।

🎯 अशोका मिशन बुद्ध विहार महरौली नई दिल्ली समारोह में पदार्पण:

2 दिसम्बर 1956 को अशोका मिशन बुद्ध विहार महरौली में परमपावन दलाईलामा जी पधारने वाले थे।बाबा साहेब का स्वास्थय खराब होने पर समारोह में उपस्थित होने में असमर्थता व्यक्त की परन्तु आयोजकों के बार-बार विशेष आग्रह पर सहमति दे दी। जैसे ही बाबासाहेव की कार अशोका मिशन के परिसर में पहुंची लोगों की भारी ने खड़े होकर जोरदार नारों से स्वागत किया।

🎯 बीमार नौकर का हालचाल जानने गये:

अगले दिन 3 दिसम्बर 1956 सोमवार को बाबा साहेव अपनी छड़ी के सहारे बंगले के पीछे बने हुए सर्वेन्ट क्वाटर में अपने बीमार सेवक रामचन्द्र को देखने गये और उसका हाल सुनकर भावुक हो गए। उसके लिए नानक चन्द रत्तू के हाथों दवाई भिजवाई।

🎯 कांग्रेस सरकार के विपक्ष के नेताओं के नाम पत्र:

अगले दिन 4 दिसम्बर 1956 मंगलवार को महराष्ट्र में कांग्रेस सरकार के विपक्ष के नेता मा. पी. के. अत्रे और मा. एस. एम. जोशी के नाम दो पत्र लिखवाए।

🎯 जैन मुनियों के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात:

अगले दिन 5 दिसम्बर 1956 बुद्धवार को कडाके की सर्दी में मुंह हाथ धोकर बुद्ध की मूर्ति के सम्मुख नमन करके बरामदे में व्यायाम करने आ गए। दोपहर को आराम किया। उसी समय घर के बाहर उनके समर्थक, उनके अनुयायी दर्शन करने आये, नानकचन्द रत्तु जी के रोकने पर बाबासाहेव ने उन्हें आने देने के लिए कहा।

परिनिर्वाण:

उसी दिन सांयकाल दो जैन मुनियों का प्रतिनिधिमंडल उनके निवास पर उनसे मिलने आया।वे बाबासाहेव की वार्तालाप से प्रभावित हुए। उनके चले जाने पर बाबासाहेव ने ‘भगवान “बुद्ध और उनका धम्म” नामक पुस्तक पुर्ण होने पर उसकी भूमिका लिख कर पूर्ण किया। 5 दिसम्बर 1956 की रात या 6 दिसम्बर वीरवार की सुबह के प्रारम्भिक घंटों में अथवा कहिए कि 5 और 6 दिसम्बर के बीच की रात में उनका परिनिर्वाण हुआ। कैसा विचित्र सत्य है कि कुशीनगर में आकर तथागत सम्यक संम्बुद्ध का महापरिनिर्वाण हुआ था। जबकि कुशीनगर से लौटकर बोधिसत्व बाबासाहेब डां. आंम्बेडकर परिनिर्वाण को प्राप्त हुए थे।

🎯 अंतिम संस्कार:

7 दिसम्बर 1956 को बौद्ध धर्म के अनुसार उनका अन्तिम संस्कार हुआ। पांच लाख से अधिक लोगों ने शवयात्रा में भाग लिया। मुम्बई शहर की यह अब तक की सबसे बड़ी शवयात्रा थी। उनके निवास स्थान राजगृह (दादर) से चैत्यभूमि (शिवाजी पार्क) तक का 3.5 किलोमीटर का सफर चार घंटे से भी अधिक समय में तय हो पाया था।

दादर चौपाटी स्थित शमशान भूमि में, जहां बाबासाहेब का दाह संस्कार सम्पन्न हुआ था, उनके श्रद्धा सम्पन्न अनुयायि यों ने एक विशाल स्मारक स्तूप का निर्माण कर दिया।जिसे श्रद्धा और सम्मान के साथ चैत्यभूमि के नाम से जानते हैं। प्रत्येक वर्ष 6 दिसम्बर के पावन अवसर पर उनके लाखों अनुयायी का मेला उनकी पवित्र शरीर धातुओं के दर्शन करने के लिए उमड़ पडता है।

बाबा साहेब के विशाल अनुयायियों की संख्या देखकर मुम्बई का जल सागर भी शर्मा जाता है। बाबा साहेब के शरीर धातुओं के दर्शन का सिलसिला कई दिनों तक चलता रहता है।
“भवतु सब्बमंगलं”

आपकी धम्म सेवा में
इन्जी. चन्द्रसैन बौद्ध
मो. 8527826364
13अप्रैल 2020

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